
शीर्षक – सच का चश्मा
डॉ एच सी विपिन कुमार जैन “विख्यात”
एक चश्मे वाला देखो, आइना बेच रहा है।
गंजो के शहर में, कंघी बेच रहा है।
ये आइना जादूई है, जो झूठ नहीं बोलता,
तेरी यह फितरत है, कि तू सच नहीं बोलता।
हर रोज दिखाता है, तू नए-नए करतब
पैंतरा बदलने की, तेरी है पुरानी आदत ।
फर्जी पत्रों के सहारे, कब तक तू चल पाएगा।
तेरा किया, तेरे सामने आएगा।
बच्चों के भविष्य के साथ, कर रहा खिलवाड़ है।
तेरी करतूतें, कैद पिंजरे में “वक्त को इन्तजार” है।
तूने आईना तो देखा ही नहीं,
गौर से,
आईना कभी झूठ बोलता नहीं,
वह तो सब की पोल पट्टी खोलता है,
भेद किसी में करता नहीं।
हेरा फेरी के मामले में,
काले कारनामों के इस खेल में।
लगेगी दफाएं बड़ी भारी-भारी,
देखेगा तू भ्रष्टाचार की लाचारी।
